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Saturday, December 27, 2025

शिशु बन जाएँ

 

हँसना चाहें तो खुल कर हसलें,

रोये तो आसुओं की बाढ़ ले आएँ

          आओ फिर से हम तुम,

          एक नवजात शिशु बन जाएँ।

 

खेलें कूदें, रोलें हंसलें,

रूठें और फिर मान भी जाएँ,

          कल का दुःख न कल चिंता,

          आओ अब मे मस्त हो जाएँ।

 

कुदरत के कानून को समझे,

कुदरत को ही शीश नवाएँ,

          जाति, पंथ, धर्म, संप्रदाय से हटकर,

          मानववता के गुण अपनाएं।

 

हैं अनंत ये ब्रह्मांड निराला,

न हम इसके मालिक बन जाएँ,

          अपने कद को पहचाने,

          झूठी शान मे न बह जाएँ।

 

स्वर्ग और पुण्य की चाहत मे न हम,

इस अनुपम धरा को नर्क बनाएँ,

          जिसने बनाया तुमको और हमको,

          हम न उसको “ईश्वर” और “खुदा” बनाएँ।

वो समय

आज बिस्तर पर पड़ा वृद्ध कोई,

सोचता है वो समय अच्छा था।

          जब हाथ पैर और शरीर से खुद को,

          औरों को भी सहारा मिलता था।

 

हाथ पैर और शरीर जिसके सलामत

सोचता है वो समय अच्छा था।

          जिम्मेदारियों के बोझ से,

          जब दिन उसका नहीं ढलता था।

 

जिम्मेदारियों की दहलीज पर खड़ा कोई,

सोचता है वो समय अच्छा था,

          माँ- बाप के साये मे उसका

          जब भरण पोषण चलता था।

 

माँ-बाप के साये मे खड़ा कोई,

सोचता है वो समय अच्छा था,

          मार पिटाई के बदले,

          जब डांट से काम चलता था।

 

माँ-बाप की गोद मे पड़ा कोई,

सोचता है ये समय कितना अच्छा है,

          सच कहे अगर वो तुमसे तो उसने,

          ईश्वर के रूप मे माँ-बाप पाए हैं।  

 

माँ-बाप की गोद मे आकर,

काव्य और समय बदल जाता है,  

          सच मानो तो उनके रूप मे इंसान,

          ईश्वर” को पा जाता है

पथिक

मैं रास्तों का आनंद लेता हूँ,

मंजिलों की चिंता नहीं सताती है।  

          जब मंजिलों की चाह न हो,

          यात्रा ही मंजिल बन जाती है।

 

मैं धूप का आनंद लेता हूँ,

दुपहरी की चिंता नहीं सताती है।

          जब सूरज से दोस्ती हो,

          जिंदगी छांव बन जाती है।

 

फूलों की चाह नहीं है,

काँटों की चिंता नहीं सताती है,

          जब छालों की फिक्र न हो,

          जिंदगी फूलों की सेज बन जाती है। 

 

खोने की फिक्र नहीं है,

पाने की चिंता नहीं सताती है,

          जब सबकुछ उसी का हो,

          ये चाह “माया” बन जाती है।      

 

मान की चाह नहीं है।

अपमान की चिंता नहीं सताती है।

          जब मान-अपमान मे संयम हो,

          जिंदगी स्वर्ग बन जाती है। 

ज़िंदगी

संसार के परिवर्तन का संदेश देने, 

नित नए नए रूप अपने दिखाती है ज़िंदगी।

 

कभी खुशी बनकर खिलखिलाती है, ये

ग़म के सागर मे कभी, गोते लगाती है ज़िंदगी।

 

कभी प्यास बनके तरसाती है ये,

प्यास बुझाने को कभी, सावन बन जाती है ज़िंदगी।

 

कभी हार बनकर मायूसी लाती है ये,

गुदगुदाने के लिए कभी, जीत बन जाती है ज़िंदगी।

 

कभी धूप बनकर सताती  है ये,

आँचल मे भर लेने को कभी, छाँव बन जाती है ज़िंदगी।

 

कभी काली रात बनकर डराती है ये,

सौन्दर्य को जगाने कभी, चाँदनी रात बन जाती है ज़िंदगी।

 

कभी अज्ञान बनकर भटकाती है ये,

पार लगाने के लिए कभी, ज्ञान बन जाती है ज़िंदगी। 

Friday, August 15, 2025

क्यों फ़र्क है तुम्हारे और मेरे धर्म मे ?

 


तुम भी जन्म लेते हो

            और मरते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी हँसते हो,

            और रोते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी भूखे होते हो,

            और प्यासे मेरी तरह

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी सांस लेते हो

            और जीते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

गिनती तुम्हारी धडकनों की,

            चलती है मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

हर बूंद रक्त लाल की तुम्हारे,

            दिखती है मेरे रक्त की तरह

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

हंसी और आँसू की तुम्हारे,

            भाषा भी है मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

दर पर उपर वाले के तुम,

            झुकते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी सोचो, हम भी सोचे,

            इस सवाल का उत्तर खोंजे,

कि, क्यों फ़र्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

जिसने बनाया हमको,

            पर, शायद, नहीं हमारे धर्म को

इसलिए फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे।  

Wednesday, November 22, 2023

सीख लीजिये

कब तक भटकते रहोगे, सुकून की तलाश मे,

अपने ही दिल मे शायर, इसे पाना सीख लीजिये।

 

कहते हैं मंजिल सफर है मुश्किलों का,

राह मे इसके कदम बढ़ाना सीख लीजिये।

 

रूठ जाते है जो रिश्ते तुम्हारे तरीकों से,

उन रिश्तों को अब, मनाना सीख लीजिये।

 

देर हो जाती है अक्सर तुम्हें घर पर आने मे,

इंतज़ार करती आँखों को, हंसाना सीख लीजिये।

 

हो जाती हैं ग़लतियाँ अपनो से कभी कभी,

माफ कर उन्हे गले से, लगाना सीख लीजिये।  

 

जरूरी नहीं हर बात मे, तुम्हारा जिक्र हो,

औरों के हुनर को साहब, अपनाना सीख लीजिये।

Monday, November 20, 2023

हार का ग़म

 इस तरह हार का ग़म मनाया नहीं करते,

खुशी के लम्हों को, यूं भुलाया नहीं करते।

 

माना कोशिशें बेकार हो गई हैं इस बार,

अपने हौसलों को, यूं गिराया नहीं करते।

 

माना कि चाहत थी चाँद छूने के तुम्हें,

मुट्ठी मे आए तारों को, यूं गिराया नहीं करते।

 

ग़म और खुशी के लिए, बरसते हैं ये आँखों से,  

हार और जीत मे ये आँसू, यूं बहाया नहीं करते।

 

जरूरी है अपने गिरेबान मे झांकना,

खुद को मयूसियों मे मगर, दफनाया नहीं करते।

 

पढ़ सकते हैं हम, तुम्हारे चेहरों कि दास्तां,

अश्क लेकर इन आंखो मे, औरों को रुलाया नहीं करते।   

Saturday, October 7, 2023

अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं

मान दिया तो घर को
स्वर्ग बना दूँ,
नहीं तो इसे नर्क मे,
बदल सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो, फूलों की सेज
सजा दूँ ,
या फिर इन्हे अंगारों मे,
बदल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो तुम्हें सर
पर बैठा लूँ,
या फिर तिनके की भांति,
मसल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “ऐश्वर्या” के रूप,
मे आकर लुभाऊँ,
पर याद रहे, “फूलन” भी
बन सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ  तो “संतोषी” बन
वर दे जाऊँ तुम्हें,
या संहार के लिए,
“दुर्गा” बन सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो “लता” बन कर,
मन पुलकित कर दूँ,
या थर्राए गर्जना से जिसके,
वो “काली” भी बन सकती हूँ मैं
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।

Monday, July 10, 2023

इंसान ही कहलाओगे

क्यों करते हो कोशिश तुम,

खुद को अलग बताने की?
और मज़हब की खातिर,
इंसानियत को बटवाने की?


कुछ भी कर लोकुछ भी कह लो,
इस तथ्य से तुमबच नहीं पाओगे,  
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (1)
 
चाहे काले वेश मे आओ,
या फिर गेरुए मे रंग जाओ,
रूप कोई अपना धर लो तुम,
हवापानी और मिट्टी एक ही पाओगे।
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (2)
 
चाहे माथे तिलक लगा लो,
या फिर सर पर ताज सजा लो,
सुख दुःख एक समान जीवन में
एक समान
तुम पाओगे।
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (3)
 
 
चाहे वेदों को तुम गालो,
या फिर आयतों को रट डालो,
तोड़ कैद इस देह की तुम,
एक जगह पर ही जाओगे।
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (4)
 
चाहे दीदार चाँद का पालो,
या फिर अर्घ्य सूर्य को डालो,
दोनों से ही जीवन किरणें,
एक समान ही तुम पाओगे। 
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (5)
 
चाहे हरे का मान बढ़ाओ,
या फिर गेरुए पर इतराओ,
रंग रक्त काकभी भी,
तुम बदल नहीं पाओगे।
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (6)
 
भेद नहीं करती बीमारी तुममे,
और नहीं महामारी तुममे,
दवा भी हर इंसान की खातिर,
तुम एक ही पाओगे।   
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (7)
 
भेद नहीं करते हैं जल मे रहने वाले,
और इस धरा पर चलने वाले,
गगन मे उड़ने वालों के लिए,
तुम एक ही समझे जाओगे,
खुद को छोड़सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (8)
 
भेद नहीं करती अग्नि तुममे,
आंच देती और खाना पकाती है।
कोई भी हो तुम
इसके रूप को
तुम एक समान ही पाओगे।
खुद को छोड़
सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (9)
 
खुद मे भेद करोइससे पहले
इतना तो सोच लिया होता
,
गर तुम्हें जो अलग बना सकता,
क्या औरों (प्राणियों) के लिए तुम उसे असमर्थ पाओगे?
खुद को छोड़सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (9)
 
मामूली होकर भी तुम,
घर अलग दे सकते हो संतानों को,
अलग धरा अपनी संतानों को,
देने मेक्या तुम उसे असमर्थ पाओगे?
खुद को छोड़सारे जहाँ के लिए,
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (10)
 
इक सूरज और चाँद बना
सकता था जो
,
इक और भी शायद  बना देता,
लेकिन उसकी मंसा को शायद,
तुम नहीं समझ पाओगे,
खुद को छोड़सारे जहाँ के लिए
तुम “इंसान” ही कहलाओगे। (11)

Friday, February 24, 2023

Success

Success, a lofty goal we strive to attain, A prize that we seek with our might and main, It's the fruit of our labor, our sweat and tears, The reward for our toil, our hopes and fears.

It's the mountain we climb, the peak we reach, The treasure we find, the lesson we teach, It's the sunrise we see, the dawn we greet, The victory we claim, the triumph we meet.

Success is not easy, it's not for the weak, It's for those who are strong, who are bold and unique, Who refuse to give up, who keep moving on, Who keep pushing ahead, until the battle is won.

Success is not just money, or fame or power, It's the journey we take, in every waking hour, It's the growth we experience, the knowledge we gain, The joy we discover, the peace we obtain.

Success is within us, it's a state of mind, It's the courage we show, when we leave fear behind, It's the love we give, the kindness we share, The hope we inspire, the dreams we dare.

So let's strive for success, with all our heart, Let's make it our mission, our purpose, our art, Let's believe in ourselves, and in what we can do, 

And success will be ours, forever true. 

Sunday, November 6, 2022

प्रार्थना

धन्यवाद करते हैं, कोटि तुम्हें हम,
इतना सब कुछ जो तुमने दिया
नई सुबह का भान दिया
जिंदगी का प्यार गान दिया

मानव रूप में जन्म दिया
स्वस्थ तन और मन दिया
नभ, जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि का उपहार दिया,
साँसें चलें जिसमे वो संसार दिया

रोटी कपड़ा और मकान दिया
जरूरी था वो सब सामान दिया
हंसता सा परिवार दिया
रिश्तों का संसार दिया

बुद्धि दी और ज्ञान दिया
भौतिक जगत में सम्मान दिया
वैभव, सुख और धन दिया
जीविका का साधन दिया

धन्यवाद करते हैं कोटि तुम्हें हम,
इतना सब कुछ जो तुमने दिया 

Monday, September 19, 2022

"तनिष्का" बहुत बधाई हो


आज जो चेहरे खिले हुए हैं

सारे दिल जो मिले हुए हैं।  

 

आज जो रौनक सी छाई है

रंगत बन कर घर आई है। 

 

आज जो रिश्ते झूम रहे हैं

और मचा सी जो धूम रहे है। 

 

आज जो खुशियां झलक रहीं है

और आँखों से जो छलक रही हैं। 

 

आज जो सारे दुःख भूल रहे है

और गर्व से सीने फूल रहे हैं। 

 

आज जो बधाइयाँ आ रही है

सफल होकर वो तुम्हें पा रही है। 

 

आज जो क्षण (अनमोल), ये तुम लाई हो,

हर दिल कहे, "तनिष्का" बहुत बधाई हो। 

Friday, September 9, 2022

कोटि कोटि आभार

कोटि कोटि आभार,
हे माधव, कोटि कोटि आभार,
मानव जाति को दे दिया तुमने
गीता का उपहार। 
                        कोटि कोटि आभार  

कौन हूँ मैं? क्या उद्देश्य है मेरा?
कौन है करता ये, साँझ सवेरा?
कौन छेड़ता जीवन रूपी 
साँसों की झंकार?
                    कोटि कोटि आभार

कौन है लेता जन्म यहाँ पर?
कौन है करता, कर्म यहाँ पर?
क्यों लेते हैं भिन्न भिन्न रूप मे,
परमेश्वर अवतार?
                    कोटि कोटि आभार

मोक्ष है क्या और मुक्ति है क्या?
विश्वरूप परमेश्वर की भक्ति है क्या?
परमधाम पर तुम्हारे पभू?
है किसका अधिकार?
                    कोटि कोटि आभार

और भी थे जो प्रश्न हमारे,
दे दिए तुमने उत्तर सारे,
मानव जाति को राह बताने 
और हमारे कष्ट मिटाने,
हम भक्तों को दे दिया तुमने,
गीता का सार
                    कोटि कोटि आभार

गीता के माध्यम से तुमने, 
जीवन कला सिखाई,
परमात्मा की भव्य सत्यता, 
तुमने ही है हमे बताई। 
और बता दिया है प्रभु जी, 
कौन है इस जगत का आधार। 
                कोटि कोटि आभार


Monday, September 5, 2022

शिक्षक दिवस


करता हूँ नमन उस माँ को, 

गिरकर -उठना 

जिसने है सिखाया। 


करता हूँ नमन उस पिता को,

औरों के लिए  जीना 

जिसने है बताया। 


करता हूँ नमन उन शिक्षक को, 

ज्ञान ज्योत को 

जिसने है जगाया। 


करता हूँ नमन उन मित्रों को, 

जीत की खातिर लढना 

जिसने है सिखाया।

Thursday, August 25, 2022

नेकी

नेकी का सलीका, कोई सीखे इन रास्तों से, 

मंजिलों तक पहुँचाते हैं, फिर भी अहसान नहीं जताते। 

Monday, August 15, 2022

आओ लहराएं हर घर तिरंगा









तुम भी आओ हम भी आएं

आजादी का पर्व मनाएं
हो फिज़ा कुछ ऐसी जिसमे
हर मन हो जाए चंगा
देशभक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा

मंदिर झूमे, मस्जिद झूमे
गिरजाघर और गुरुद्वारे भी झूमे
मदमस्त धुन में लहराकर
गगन हो जाए कुछ रंग बिरंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा

हर जन झूमे हर जन गाए
मातृभूमि को शीष नवाएं
हर दिल को पवन कर जाए
ऐसी आज बह जाए गंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा

एकता के सूत्र में रहकर
दिखलाना है देशप्रेम की शक्ति,
गलती से भी कमजोर समझ
कोई हमसे न ले जाए पंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा