आज बिस्तर पर पड़ा वृद्ध कोई,
सोचता है वो समय अच्छा था।
जब हाथ पैर और शरीर से खुद को,
औरों को भी सहारा मिलता था।
हाथ पैर और शरीर जिसके सलामत
सोचता है वो समय अच्छा था।
जिम्मेदारियों के बोझ से,
जब दिन उसका नहीं ढलता था।
जिम्मेदारियों की दहलीज पर
खड़ा कोई,
सोचता है वो समय अच्छा था,
माँ- बाप के साये मे उसका
जब भरण पोषण चलता था।
माँ-बाप के साये मे खड़ा कोई,
सोचता है वो समय अच्छा था,
मार पिटाई के बदले,
जब डांट से काम चलता था।
माँ-बाप की गोद मे पड़ा कोई,
सोचता है ये समय कितना अच्छा
है,
सच कहे अगर वो तुमसे तो उसने,
ईश्वर के रूप मे माँ-बाप पाए हैं।
माँ-बाप की गोद मे आकर,
काव्य और समय बदल जाता है,
सच मानो तो उनके रूप मे इंसान,
“ईश्वर” को पा जाता है
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