संसार के परिवर्तन का संदेश देने,
नित नए नए रूप अपने दिखाती
है ज़िंदगी।
कभी खुशी बनकर खिलखिलाती है,
ये
ग़म के सागर मे कभी, गोते
लगाती है ज़िंदगी।
कभी प्यास बनके तरसाती है
ये,
प्यास बुझाने को कभी, सावन
बन जाती है ज़िंदगी।
कभी हार बनकर मायूसी लाती है
ये,
गुदगुदाने के लिए कभी, जीत बन
जाती है ज़िंदगी।
कभी धूप बनकर सताती है ये,
आँचल मे भर लेने को कभी,
छाँव बन जाती है ज़िंदगी।
कभी काली रात बनकर डराती है
ये,
सौन्दर्य को जगाने कभी, चाँदनी
रात बन जाती है ज़िंदगी।
कभी अज्ञान बनकर भटकाती है
ये,
पार लगाने के लिए कभी, ज्ञान
बन जाती है ज़िंदगी।
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