मान दिया तो घर को
स्वर्ग बना दूँ,
नहीं तो इसे नर्क मे,
बदल सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो, फूलों की सेज
सजा दूँ ,
या फिर इन्हे अंगारों मे,
बदल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो तुम्हें सर
पर बैठा लूँ,
या फिर तिनके की भांति,
मसल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “ऐश्वर्या” के रूप,
मे आकर लुभाऊँ,
पर याद रहे, “फूलन” भी
बन सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “संतोषी”
बन
वर दे जाऊँ तुम्हें,
या संहार के लिए,
“दुर्गा” बन सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “लता” बन कर,
मन पुलकित कर दूँ,
या थर्राए गर्जना से जिसके,
वो “काली” भी बन सकती हूँ मैं
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
स्वर्ग बना दूँ,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
पर बैठा लूँ,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “ऐश्वर्या” के रूप,
मे आकर लुभाऊँ,
वर दे जाऊँ तुम्हें,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
No comments:
Post a Comment