अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
नेकी का सलीका, कोई सीखे इन रास्तों से,
मंजिलों तक पहुँचाते हैं, फिर भी अहसान नहीं जताते।
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