जागा था मानो, आज,
जैसे कोई, चिरनिद्रा के बाद,
आई थी सुबह, आज की,
कुछ अचंभे के साथ !
सूरज की किरणें समा रही थीं,
हर अंग और हर रक्त कण में,
हवा भी जैसे छू रही थी,
दिल के हर कोने को !
दिन की प्रभा भी,
आज दिव्यता के साथ आयी थी!
कण कण मे इस धरा के,
मानो रौशनी सी समाई थी !
नव-जात किरणें, धरती के,
चरणों को चूम रही थीं!
हँस रहे थे फूल सारे,
हर कली खुद मे झूम रही थी !
फूलों की भी गंध,
पवन मे घुल रही थी,
पक्षियों की भी,
तान से तान मिल रही थी!
लग रही थी आज मानो,
हर ख़्वाहिश जैसे पूरी सी!
और, हर सपना मानो पूरा सा,
नहीं कोई हसरत जरूरी सी!
इतनी शांति! मानो जैसे,
मुहूर्त हो ब्रह्म का!
रोम रोम महसूस करता
“आनंद” मानो दिव्य सा !
महसूस होता जैसे,
हूँ “संतोष” के शिखर पर!
हो जैसे मानो बांसुरी,
खुद कृष्ण के “अधर” पर!
रंग आसमा का भी,
जैसे चमक स्वर्ण सी कोई,
धरा ने भी हरियाली की,
ओढ़ की थी चादर नई!
जन्म लेता मन मे,
हर पल एक प्रश्न नया
जिज्ञासा जैसे हो कोई,
एक नवजात बालक की !
क्यूँ, कब, कैसे, कहाँ,
कब तक, किसने, कौन?
उत्तर सबका एक ही,
बस चारों ओर “मौन”!
आँखें भी, अब हो चली थी,
कुछ नम सी, इस दिव्य छटा से,
आशा बस थी अब,
बस उस परम पिता से!
करबद्ध होकर, हृदय से,
बस उसको पुकारा था,
तभी मानो किसी स्नेह से,
माथे को दुलारा था!
पानी की कुछ बूंदे,
चेहरे को छु रही थी,
आँखें खुली तो देखा,
माँ रो रही थी!!
आँखें खुली, जब मेरी,
आँचल मे उसने भर लिया
स्नेह का समुंदर जैसे,
मुझपे उढेल दिया !
प्रश्न मानो खुद बख़ुद,
हल जैसे हो रहे थे !
मात-पिता भाई-बहिन,
जब अपने आँसू पोछ रहे थे !
बस एक ही सवाल,
जिसका न अब जवाब था,
जागा मैं अब हूँ?
या सोया मैं अब था !

Very beautiful lines :)
ReplyDeletehttp://zigzacmania.blogspot.in/
Thank you :) for your kind words of appreciation :)
ReplyDeleteBeautiful !!
ReplyDeleteThanks Pushkar !!
Deleteवाजिब प्रश्न ... कमाल की रचना है ...
ReplyDeleteThanks Digamber Ji :)
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