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Wednesday, May 13, 2015

साक्षात्कार.....


जागा था मानोआज,
जैसे कोईचिरनिद्रा के बाद,
आई थी सुबहआज की,
कुछ अचंभे के साथ !

सूरज की किरणें समा रही थीं,
हर अंग और हर रक्त कण में,
हवा भी जैसे छू रही थी,
दिल के हर कोने को !

दिन की प्रभा भी,
आज दिव्यता के साथ आयी थी!
कण कण मे इस धरा के,
मानो रौशनी सी समाई थी !

नव-जात किरणेंधरती के,
चरणों को चूम रही थीं!
हँस रहे थे फूल सारे,
हर कली खुद मे झूम रही थी !

फूलों की भी गंध,
पवन मे घुल रही थी,
पक्षियों की भी,
तान से तान मिल रही थी!

लग रही थी आज मानो,
हर ख़्वाहिश जैसे पूरी सी!
औरहर सपना मानो पूरा सा,
नहीं कोई हसरत जरूरी सी!

इतनी शांति! मानो जैसे,
मुहूर्त हो ब्रह्म का!
रोम रोम महसूस करता
आनंदमानो दिव्य सा !

महसूस होता जैसे,
हूँ संतोषके शिखर पर!
हो जैसे मानो बांसुरी,
खुद कृष्ण के अधरपर!

रंग आसमा का भी,
जैसे चमक स्वर्ण सी कोई,
धरा ने भी हरियाली की,
ओढ़ की थी चादर नई!

जन्म लेता मन मे,
हर पल एक प्रश्न नया
जिज्ञासा जैसे हो कोई,
एक नवजात बालक की !

क्यूँकबकैसेकहाँ,
कब तककिसनेकौन?
उत्तर सबका एक ही,
बस चारों ओर मौन”!

आँखें भीअब हो चली थी,
कुछ नम सीइस दिव्य छटा से,
आशा बस थी अब,
बस उस परम पिता से!

करबद्ध होकरहृदय से,
बस उसको पुकारा था,
तभी मानो किसी स्नेह से,
माथे को दुलारा था!

पानी की कुछ बूंदे,
चेहरे को छु रही थी,
आँखें खुली तो देखा,
माँ रो रही थी!!

आँखें खुलीजब मेरी,
आँचल मे उसने भर लिया
स्नेह का समुंदर जैसे,
मुझपे उढेल दिया !

प्रश्न मानो खुद बख़ुद,
हल जैसे हो रहे थे !
मात-पिता भाई-बहिन,
जब अपने आँसू पोछ रहे थे !

बस एक ही सवाल,
जिसका न अब जवाब था,
जागा मैं अब हूँ?
या सोया मैं अब था !


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