हँसना चाहें तो खुल कर हसलें,
रोये तो आसुओं की बाढ़ ले आएँ
आओ फिर से हम तुम,
एक नवजात शिशु बन जाएँ।
खेलें कूदें, रोलें हंसलें,
रूठें और फिर मान भी जाएँ,
कल का दुःख न कल चिंता,
आओ अब मे मस्त हो जाएँ।
कुदरत के कानून को समझे,
कुदरत को ही शीश नवाएँ,
जाति, पंथ, धर्म, संप्रदाय से हटकर,
मानववता के गुण अपनाएं।
हैं अनंत ये ब्रह्मांड
निराला,
न हम इसके मालिक बन जाएँ,
अपने कद को पहचाने,
झूठी शान मे न बह जाएँ।
स्वर्ग और पुण्य की चाहत मे न
हम,
इस अनुपम धरा को नर्क बनाएँ,
जिसने बनाया तुमको और हमको,
हम न उसको “ईश्वर” और “खुदा” बनाएँ।
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