मैं रास्तों का आनंद लेता हूँ,
मंजिलों की चिंता नहीं सताती
है।
जब मंजिलों की चाह न हो,
यात्रा ही मंजिल बन जाती है।
मैं धूप का आनंद लेता हूँ,
दुपहरी की चिंता नहीं सताती
है।
जब सूरज से दोस्ती हो,
जिंदगी छांव बन जाती है।
फूलों की चाह नहीं है,
काँटों की चिंता नहीं सताती
है,
जब छालों की फिक्र न हो,
जिंदगी फूलों की सेज बन जाती है।
खोने की फिक्र नहीं है,
पाने की चिंता नहीं सताती है,
जब सबकुछ उसी का हो,
ये चाह “माया” बन जाती है।
मान की चाह नहीं है।
अपमान की चिंता नहीं सताती
है।
जब मान-अपमान मे संयम हो,
जिंदगी स्वर्ग बन जाती है।
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