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Sunday, April 18, 2021

क्योंकि मैं एक बैंकर हूँ।



चले आते हो अपनी,

गाढ़ी कमाई को लेकर।

और जाते हो जैसे,

चिंता पराई सी देकर।

सहेजता हूँ धन को,

मानो जैसे एक "अभयंकर" हूँ।

क्योंकि मैं एक "बैंकर" हूँ।  


मुफ्त नहीं धन,

तुम्हारा हूँ लेता।

ब्याज ही नहीं,

हूँ सुरक्षा भी देता।

हरदम “कटाक्ष विष”,

पीने वाला "शंकर" हूँ।

क्योंकि मैं एक "बैंकर" हूँ।

 

“सार्थक तुम्हारे,

धन को हूँ कर देता।

"ऋण" जरूरत मंद,

को हूँ जब देता।

फिर भी मानो, सबके लिए,

रास्ते का एक कंकर हूँ।

क्योंकि मैं एक "बैंकर" हूँ।

 

चोरों और बुरी नज़रों,

से हूँ बचाता।

बेफिक्री और गहरी,

नींद तुम्हें हूँ सुलाता।

भय, चोरी, बेईमानी से बचाता,

एक मजबूत "बंकर" हूँ।

क्योंकि मैं एक "बैंकर" हूँ।

 

यूं ही नहीं कोई,

सर्वस्व है छोड़ जाता।

नित्य चले वो रिश्ता,

है जोड़ जाता।

प्रतीक, भरोसे और विश्वास का,

एक सरल सा "एंकर" हूँ।

क्योंकि मैं एक "बैंकर" हूँ।