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Sunday, February 16, 2014

दर्द... (THE SORROW)


आदत सी, दर्द सहने की, हो गई है कुछ इस तरह, 
अपने ही ज़ख्मों को यारों, हम खुद कुरेदते रहते हैं....

Saturday, February 15, 2014

तू... (YOU)


चल रही थी तेरे साथ, कायनात, ये मेरे संग, 
न साथ हैं तेरे वगैर, खुद मेरे अपने कदम.... 


Friday, January 31, 2014

ये कैसी काबिलियत !



तेरे आने से पहले,
ठोकरें, मैं खा चूका था,
काबिलियत के सदमे,
दिल में दबा चुका था....

तेरे आने को, हमने,
एक कसौटी समझा था,
आवाज दिल की, इसलिए शायद,
मैं, न समझा था...

काबिलियत का एक जूनून,
सर पे सवार था,
मान बैठा, इसलिए शायद,
कि, न तुझसे प्यार था,

तेरा मिलना, हमने सहारे,
किस्मत के, छोड़ दिया था,
तन मन धन, ये सब,
काबिलियत पे झोक दिया था..

मिलना तेरा, आसान होगा,
काबिल बनके, ऐसा कुछ लगा था,
ये समझके, शायद तुझसे,
दूर मैं, खुद हो चला था...

ग़लती, शायद इतनी,
मैं कर गया था,
न सोचा कभी मायने,
काबिलियत का, तेरे लिए क्या था...

तुझको भी माँगा खुदा से,
पर, काबिलियत के बाद,
शायद इसी बात पे,
था वो मुझसे नाराज़...

दे तो दी, उसने,
काबिलियत थी मुझे,
वापस लौटने की, लेकिन,
न फुर्सत दी, मुझे...

देर बहुत, हो चुकी,
मगर, ये एहसास है मुझे,
बन गया हूँ काबिल, अब,
पर, खो दिया है तुझे......

Thursday, January 16, 2014

राजनीति.. (POLITICS)



“अलबेला !” एक गाँव को,
लोग सभी कहते थे I
जिसमे “कला”, “विज्ञान” और,
“संस्कृति” रहते थे I

तीनों में था, अजब !,
सामंजस्य और प्यार I
हरदम करते,
जन जन का उद्धार I

“कला” हमेशा ढूंढा करती,
छुपी हुई प्रतिभाओं को I
और उन्हें फिर आगे लाती,
देती जन्म नयी कलाओं को I

“संस्कृति” थी फैलाती हरदम,
आदर, प्रेम और सत्कार I
जन जन को थे, बांधे रखते,
इसके निर्मल संस्कार I

“विज्ञान” बनाता था जन जन के,
जीवन को आसान I
और फैलाता,
तथ्यों का सार्थक ज्ञान I

रहते सदा ही,
मिलजुल के तीनो I
रहते थे परमार्थ हेतु,
सदैव तत्पर तीनों I

उनकी इस मैत्री से,
गाँव भी फलफूल रहा था I
और तरक्की की,
उचाईयों पे झूल रहा था I

जन जन भी करते थे इनका,
आदर और सत्कार I
इनकी खातिर, प्राण न्योछावर,
को रहते हरदम तैयार I

घटना अजब ! सी फिर,
इक देखने को आयी I
रहने को उनके गाँव में,
“राजनीति” जब थी आयी I

देखा उसने, कि,
चहुँओर उन तीनो का बोलबाला है I
उसकी चतुराई की बातों को,
कोई न सुनने वाला है I

चालाकी का उसने,
फिर इक जाल बिछाया I
उन तीनों को फिर,
आपस में लड़वाया I

अब न ही,
“कला”, गाँव सजाती थी,
“संस्कृति” भी न,
अब कर्तव्य निभाती थी I

“विज्ञान” भी न करता था,
अब खुद में विश्वास I
तथ्यों और अविष्कारों का,
रोज़ उड़ता अब उपहास I

धीरे धीरे चारों ओर,
अब “राजनीति” का बोलबाला था I
“झूठ” का था, अब राज गाँव पे,
और “सच” का मुँह काला था !!!

Saturday, January 4, 2014

तेरे बिना... (WITHOUT YOU)



सोचता हूँ... क्यूँ?
लगता है हर “दिन” ऐसे,
ओढ़ के चादर सफ़ेद कोई,
“रात” काली आयी है !

क्यूँ? लगती हैं ऐसे,
ये नव-प्रभात “किरणें”,
“आग” मानो किसीने, बहाने,
रौशनी के बरसाई है !

क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये भंवरे की “गुंजन”,
धुन कोई “कर्कश” सी,
शायद किसी ने बजायी है !

क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये फूलों की “खुशबु”,
 रोकने ये मानो, दिल की,
धडकनों को आयी है !

क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये चंदा की “चांदनी”,
“रौशनी” बनके ये, धधकते,
ज्वालामुखी से आयी है !

क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये तारों की टिमटिम,
अंगारों की “बारात” कोई,
आसमां में आयी है !

फिर, सोचता हूँ आजकल,
कहाँ? खो गया,
मेरा चैन, हर एक पल...

मालूम चला, इन सबके पीछे,
बस इतनी सी बात थी !!
यूँ तो साथ था, इस कायनात का,
बस इक “तू” ही न मेरे साथ थी !!




Friday, January 3, 2014

व्यथा... (TRAGEDY)



पहली बार, पुलिस थाने में,
एक अनोखा ! केस आया,
“नवजात” बेटी का गला,
एक माँ ने था दबाया !

पूंछा गया माँ से,
क्यूँ? ऐसा कदम उठाया,
क्या? शादी के दहेज़ की,
चिंता ने था सताया..

“छोडिये साब”, दहेज़ की चिंता,
अब किसको सताती है,
कंधे से कन्धा मिलाके,
बेटियाँ अब कमाती हैं I

फिर क्यूँ ? तुमने ये,
दर्दनाक कदम उठाया,
क्या तुम्हारा ऐसा करते,
दिल नहीं घबराया ?

फिर बोली वो..........बहुत सोचके,
है ये कदम उठाया,
कई बार इस जहां में,
उसे मरने से है बचाया !!

कैसे?, बड़े आश्चर्य ! से,
पूंछा गया उस माँ से,
सन्नाटा सा था छा गया,
जिसके उस बयाँ से,

माँ बोली.... मरती है पहली बार,
जब “कंधे का बोझ” कहते हो !
मरती है दूजी बार जब,
“अबला” इसे समझते हो !
मरती है तीजी बार जब,
बेटों से नीचा समझते हो !
मरती है चौथी बार जब,
चरित्र पे ताने कसते हो !
और, मर ही जाती है हर बार,
जब तुम “शील” को इसके डसते हो !!!

“साब”, ... तुम ही बताओ,
क्या करती वो जीके इस जहाँ में,
मरना ही था जब, उसको,
कई बार इस जहाँ में I

“साब”, .... विनती इतनी सी हैं,
इस माँ की,
करो व्यवस्था ऐसी,
आप यहाँ की i

“बेटियाँ” जब घर से निकलें,
दिल में उनके डर न आये,
घुमे फिरें, मस्ती में अपनी,
कोई न उनकी “इज्जत” खाय I

नहीं कोई माँ फिर ये,
“कृत्य” दोहरायेगी,
बेटी पैदा होने पे,
वो खुलके “जश्न” मनायेगी !!







Friday, August 23, 2013

मुझे जीने दो... (THE VOICE OF A GIRL)

निकलूं मैं क्यूँ बाहर,
सीने में डर को लेकर?
क्यूँ रास्तों पे चलूँ मैं,
नज़रें मेरी झुकाकर?

क्यूँ सहमी सीरहूँ मैं,
खुद अपने ही शहर में ?
क्यूँ दबी सी रहूँ मैं,
अपने ही बसर में?

क्यूँ रास्तों पे चलते मुझे,
नजरें वो घूरतीं हैं ?
क्यूँ स्वभिमान मेरा,
हर वक्त चीरतीं हैं ?

क्यूँ करूँ सफ़र मैं,
मिर्ची का स्प्रे लेकर ?
क्यूँ निकलूं मैं बाहरकिसी
सहारे को लेकर ?

क्यूँ याद नहीं होतीतुम्हे
अपनी माँबहनबेटी ?
जब जल्लादों की तरह,
इज्जत मेरी लूटी.....

मुझको भी मेरी साँसों को,
आजाद हैंये कहने दो......
अपनी ही तरह मुझको भी,
सर उठा के जीने दो...