सोचता हूँ... क्यूँ?
लगता है हर “दिन” ऐसे,
ओढ़ के चादर सफ़ेद कोई,
“रात” काली आयी है !
क्यूँ? लगती हैं ऐसे,
ये नव-प्रभात “किरणें”,
“आग” मानो किसीने, बहाने,
रौशनी के बरसाई है !
क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये भंवरे की “गुंजन”,
धुन कोई “कर्कश” सी,
शायद किसी ने बजायी है !
क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये फूलों की “खुशबु”,
रोकने ये मानो, दिल की,
धडकनों को आयी है !
क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये चंदा की “चांदनी”,
“रौशनी” बनके ये, धधकते,
ज्वालामुखी से आयी है !
क्यूँ? लगती है ऐसे,
ये तारों की टिमटिम,
अंगारों की “बारात” कोई,
आसमां में आयी है !
फिर, सोचता हूँ आजकल,
कहाँ? खो गया,
मेरा चैन, हर एक पल...
मालूम चला, इन सबके पीछे,
बस इतनी सी बात थी !!
यूँ तो साथ था, इस कायनात का,
बस इक “तू” ही न मेरे साथ थी !!
wow.. :)
ReplyDeleteThanks :)
DeleteWah mere Kavi Gaurishankar kya alfaj utare hai kalamse aapne....kya alfaj utare hai kalam se aapne.....kagaj pe nahi sidha likha hai dil pe aapne
ReplyDeleteDhanyavad... :) kavitayen to aap bhi kar lete ho yaar :)
Delete