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Thursday, January 16, 2014

राजनीति.. (POLITICS)



“अलबेला !” एक गाँव को,
लोग सभी कहते थे I
जिसमे “कला”, “विज्ञान” और,
“संस्कृति” रहते थे I

तीनों में था, अजब !,
सामंजस्य और प्यार I
हरदम करते,
जन जन का उद्धार I

“कला” हमेशा ढूंढा करती,
छुपी हुई प्रतिभाओं को I
और उन्हें फिर आगे लाती,
देती जन्म नयी कलाओं को I

“संस्कृति” थी फैलाती हरदम,
आदर, प्रेम और सत्कार I
जन जन को थे, बांधे रखते,
इसके निर्मल संस्कार I

“विज्ञान” बनाता था जन जन के,
जीवन को आसान I
और फैलाता,
तथ्यों का सार्थक ज्ञान I

रहते सदा ही,
मिलजुल के तीनो I
रहते थे परमार्थ हेतु,
सदैव तत्पर तीनों I

उनकी इस मैत्री से,
गाँव भी फलफूल रहा था I
और तरक्की की,
उचाईयों पे झूल रहा था I

जन जन भी करते थे इनका,
आदर और सत्कार I
इनकी खातिर, प्राण न्योछावर,
को रहते हरदम तैयार I

घटना अजब ! सी फिर,
इक देखने को आयी I
रहने को उनके गाँव में,
“राजनीति” जब थी आयी I

देखा उसने, कि,
चहुँओर उन तीनो का बोलबाला है I
उसकी चतुराई की बातों को,
कोई न सुनने वाला है I

चालाकी का उसने,
फिर इक जाल बिछाया I
उन तीनों को फिर,
आपस में लड़वाया I

अब न ही,
“कला”, गाँव सजाती थी,
“संस्कृति” भी न,
अब कर्तव्य निभाती थी I

“विज्ञान” भी न करता था,
अब खुद में विश्वास I
तथ्यों और अविष्कारों का,
रोज़ उड़ता अब उपहास I

धीरे धीरे चारों ओर,
अब “राजनीति” का बोलबाला था I
“झूठ” का था, अब राज गाँव पे,
और “सच” का मुँह काला था !!!

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