सीने में डर को लेकर?
क्यूँ रास्तों पे चलूँ मैं,
नज़रें मेरी झुकाकर?
क्यूँ सहमी सी, रहूँ मैं,
खुद अपने ही शहर में ?
क्यूँ दबी सी रहूँ मैं,
अपने ही बसर में?
क्यूँ रास्तों पे चलते मुझे,
नजरें वो घूरतीं हैं ?
क्यूँ स्वभिमान मेरा,
हर वक्त चीरतीं हैं ?
क्यूँ करूँ सफ़र मैं,
मिर्ची का स्प्रे लेकर ?
क्यूँ निकलूं मैं बाहर, किसी
सहारे को लेकर ?
क्यूँ याद नहीं होती, तुम्हे
अपनी माँ, बहन, बेटी ?
जब जल्लादों की तरह,
इज्जत मेरी लूटी.....
मुझको भी मेरी साँसों को,
आजाद हैं, ये कहने दो......
अपनी ही तरह मुझको भी,
सर उठा के जीने दो...
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