तेरे आने से पहले,
ठोकरें, मैं खा चूका था,
“काबिलियत” के सदमे,
दिल में दबा चुका था....
तेरे आने को, हमने,
एक कसौटी समझा था,
आवाज दिल की, इसलिए शायद,
मैं, न समझा था...
“काबिलियत” का एक जूनून,
सर पे सवार था,
मान बैठा, इसलिए शायद,
कि, न तुझसे प्यार था,
तेरा मिलना, हमने सहारे,
किस्मत के, छोड़ दिया था,
तन मन धन, ये सब,
“काबिलियत” पे झोक दिया था..
मिलना तेरा, आसान होगा,
काबिल बनके, ऐसा कुछ लगा था,
ये समझके, शायद तुझसे,
दूर मैं, खुद हो चला था...
ग़लती, शायद इतनी,
मैं कर गया था,
न सोचा कभी मायने,
काबिलियत का, तेरे लिए क्या था...
तुझको भी माँगा खुदा से,
पर, काबिलियत के बाद,
शायद इसी बात पे,
था वो मुझसे नाराज़...
दे तो दी, उसने,
“काबिलियत” थी मुझे,
वापस लौटने की, लेकिन,
न फुर्सत दी, मुझे...
देर बहुत, हो चुकी,
मगर, ये एहसास है मुझे,
बन गया हूँ काबिल, अब,
पर, खो दिया है तुझे......
Mashallah :)
ReplyDeleteThanks for appreciation :)
ReplyDeleteVery Nice!! :)
ReplyDeleteThanks Mausumi for support and motivation :)
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