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Friday, August 15, 2025

क्यों फ़र्क है तुम्हारे और मेरे धर्म मे ?

 


तुम भी जन्म लेते हो

            और मरते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी हँसते हो,

            और रोते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी भूखे होते हो,

            और प्यासे मेरी तरह

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी सांस लेते हो

            और जीते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

गिनती तुम्हारी धडकनों की,

            चलती है मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

हर बूंद रक्त लाल की तुम्हारे,

            दिखती है मेरे रक्त की तरह

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

हंसी और आँसू की तुम्हारे,

            भाषा भी है मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

दर पर उपर वाले के तुम,

            झुकते हो मेरी तरह,

फिर क्यों फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

तुम भी सोचो, हम भी सोचे,

            इस सवाल का उत्तर खोंजे,

कि, क्यों फ़र्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे?

 

जिसने बनाया हमको,

            पर, शायद, नहीं हमारे धर्म को

इसलिए फर्क है,

            तुम्हारे और मेरे धर्म मे।  

Wednesday, November 22, 2023

सीख लीजिये

कब तक भटकते रहोगे, सुकून की तलाश मे,

अपने ही दिल मे शायर, इसे पाना सीख लीजिये।

 

कहते हैं मंजिल सफर है मुश्किलों का,

राह मे इसके कदम बढ़ाना सीख लीजिये।

 

रूठ जाते है जो रिश्ते तुम्हारे तरीकों से,

उन रिश्तों को अब, मनाना सीख लीजिये।

 

देर हो जाती है अक्सर तुम्हें घर पर आने मे,

इंतज़ार करती आँखों को, हंसाना सीख लीजिये।

 

हो जाती हैं ग़लतियाँ अपनो से कभी कभी,

माफ कर उन्हे गले से, लगाना सीख लीजिये।  

 

जरूरी नहीं हर बात मे, तुम्हारा जिक्र हो,

औरों के हुनर को साहब, अपनाना सीख लीजिये।

Monday, November 20, 2023

हार का ग़म

 इस तरह हार का ग़म मनाया नहीं करते,

खुशी के लम्हों को, यूं भुलाया नहीं करते।

 

माना कोशिशें बेकार हो गई हैं इस बार,

अपने हौसलों को, यूं गिराया नहीं करते।

 

माना कि चाहत थी चाँद छूने के तुम्हें,

मुट्ठी मे आए तारों को, यूं गिराया नहीं करते।

 

ग़म और खुशी के लिए, बरसते हैं ये आँखों से,  

हार और जीत मे ये आँसू, यूं बहाया नहीं करते।

 

जरूरी है अपने गिरेबान मे झांकना,

खुद को मयूसियों मे मगर, दफनाया नहीं करते।

 

पढ़ सकते हैं हम, तुम्हारे चेहरों कि दास्तां,

अश्क लेकर इन आंखो मे, औरों को रुलाया नहीं करते।   

Saturday, October 7, 2023

अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं

मान दिया तो घर को
स्वर्ग बना दूँ,
नहीं तो इसे नर्क मे,
बदल सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो, फूलों की सेज
सजा दूँ ,
या फिर इन्हे अंगारों मे,
बदल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो तुम्हें सर
पर बैठा लूँ,
या फिर तिनके की भांति,
मसल सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
चाहूँ तो “ऐश्वर्या” के रूप,
मे आकर लुभाऊँ,
पर याद रहे, “फूलन” भी
बन सकती हूँ मैं,
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ  तो “संतोषी” बन
वर दे जाऊँ तुम्हें,
या संहार के लिए,
“दुर्गा” बन सकती हूँ मैं।
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।
 
चाहूँ तो “लता” बन कर,
मन पुलकित कर दूँ,
या थर्राए गर्जना से जिसके,
वो “काली” भी बन सकती हूँ मैं
क्योंकि अबला नहीं, नारी शक्ति हूँ मैं।