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Saturday, May 25, 2019

तलाश किसकी ??

जब ग़म की तलाश है,
तो खुशी मिले कहाँ से!
जब रोने की तलाश है,
तो हँसी मिले कहाँ से!

जब गिरने की तलाश है,
तो कोई सम्हले कहाँ से!
जब रूठने की तलाश है,
तो कोई बहले कहाँ से!

जब काँटों की तलाश है,
तो मिले फूल कहाँ से !
जब सहेजने की तलाश है,
तो भूल मिले कहाँ से !

जब पतझर की तलाश है,
तो बाहर मिले कहाँ से!
जब नफरत की तलाश है!
तो प्यार मिले कहाँ से !

जब नास्तिकी की तलाश है,
तो बंदगी मिले कहाँ से !
जब मौत की तलाश है,
तो ज़िंदगी मिले कहाँ से !

मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ...

रुके  बिना नित,
चलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

धूप हो या,
छांव हो,
छाले पड़े
या घाव हो
अपनी राह पकड़ता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

सुख हो या,
दुःख हो,
आंधियों का,
चाहे रुख हो,
यूं ही नहीं पिघलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

फूलों की
आशा नहीं करता,
काँटों से भी,
नहीं हूँ डरता,
कभी कभी अंगारों से भी मिलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

रुके  बिना नित,
चलता हूँ,
मैं,
इसलिए आगे बढ़ता हूँ। 

Monday, February 5, 2018

स्वार्थ...


स्वार्थी ! कौन?
मैं, तुम या फिर हम?
शायद “हम”
हाँ, सचमुच हम।

धरा, जिसने दी,
पैर रखने को जमीन,
हमने क्या दिया उसे?
गंदगी, सूखा, बाढ़ !

हवा, जिसने दी खुशबू,
और साँसे,
हमने क्या दिया उसे?
रसायन और गैसें!

जल, जो हैं जीवन का
आधार,
हमने क्या दिया इसको?
नदी, तालाब, कुओं का नाश!
और जो शेष रहे उनको गंदगी !

आकाश, जो है, हमारा आवरण
और देता हमे जीने, का पर्यावरण।
क्या दिया इसको हमने?
जहरीली गैस और धुआँ
या फिर शहरों की धूल !

अग्नि ! इसको कुछ
नहीं दिया !!
क्योंकि हमने अभी
नहीं इसको वश मे किया।

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि
और आकाश,
जो देते हैं खाना, पीना,
और प्रकाश!

सम्मान करेंगे इनका,
तो जनम खिल जाएगा।
नहीं तो अधोगति के बाद
खाक मे सब मिल जाएगा!

Monday, January 29, 2018

आत्मा कथा....


क्या बचपन, क्या जवानी,
क्या सुबह और क्या शाम,
बना रखा था इसने,
मुझे खुद का ग़ुलाम।

क्या सही और क्या गलत,
और बिना पछताए,
पसंद थे जो सभी,
काम मुझसे करवाए।

उठना हो या, सोना हो,
हँसना हो या रोना हो,
करता मैं सब कुछ ऐसे,
जैसे कोई खिलोना हो।

जो मैं था, उसे ये
खुद को बताता रहा,
मुझे इस जहां से,
छुपाता रहा।

गर चला अब और,
इसकी राह पर,
न हो फिर परमगति,
की चाह फिर।

एक न चलेगी इसकी,
ऐसा कुछ अब सोच लिया है,
खुद को क्योंकि मैंने अब,
खोज लिया है।

सारथी है ये मेरा,
इसको ये मानना होगा,
मैं हूँ क्या, अब इसे,
ये जानना होगा।

करके वश मे इसको,
ले जाऊंगा अब वहाँ पे,
भवसागर से तरने वाला,
रहता है जहां पे।