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Saturday, May 25, 2019

मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ...

रुके  बिना नित,
चलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

धूप हो या,
छांव हो,
छाले पड़े
या घाव हो
अपनी राह पकड़ता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

सुख हो या,
दुःख हो,
आंधियों का,
चाहे रुख हो,
यूं ही नहीं पिघलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

फूलों की
आशा नहीं करता,
काँटों से भी,
नहीं हूँ डरता,
कभी कभी अंगारों से भी मिलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।

रुके  बिना नित,
चलता हूँ,
मैं,
इसलिए आगे बढ़ता हूँ। 

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