क्या बचपन, क्या जवानी,
क्या सुबह और
क्या शाम,
बना रखा था इसने,
मुझे खुद का
ग़ुलाम।
क्या सही और
क्या गलत,
और बिना पछताए,
पसंद थे जो सभी,
काम मुझसे
करवाए।
उठना हो या, सोना हो,
हँसना हो या
रोना हो,
करता मैं सब कुछ
ऐसे,
जैसे कोई खिलोना
हो।
जो मैं था, उसे ये
खुद को बताता
रहा,
मुझे इस जहां से,
छुपाता रहा।
गर चला अब और,
इसकी राह पर,
न हो फिर परमगति,
की चाह फिर।
एक न चलेगी इसकी,
ऐसा कुछ अब सोच
लिया है,
खुद को क्योंकि
मैंने अब,
खोज लिया है।
सारथी है ये
मेरा,
इसको ये मानना
होगा,
मैं हूँ क्या, अब इसे,
ये जानना होगा।
करके वश मे इसको,
ले जाऊंगा अब
वहाँ पे,
भवसागर से तरने
वाला,
रहता है जहां
पे।

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