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Tuesday, February 28, 2017

वो...

(वो... जो निभाती है कई किरदार हमारे जीवन मे। उसी के कुछ किरदारों को समर्पित एक छोटी सी रचना!) 

हाथों को रखा उसने,
जब सर पर मेरे,
स्वर्ग बन गया वो,
जो अब तक एक जहान था।

कदमों ने उसके छुआ,
जब आँगन को मेरे,
घर बन गया वो,
जो अब तक मकान था।

प्रेरणा जो दी उसने,
हौसलों को मेरे,
हकीकत बन गया वो,
जो अब तक एक अरमान था।

और, चलने लगी,
जब संग वो मेरे,
मंज़िल बन गया वो,
जो अब तक एक मुक़ाम था। 

Tuesday, March 22, 2016

गिरने की चिंता ?


जब गिरते नहीं पत्ते सूखे,
नाज़ुक से पत्ते फिर उगते कहाँ से ?
जब गिरते नहीं वृक्षों से फल,
बीज नए वृक्षों के फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरतीं नहीं बारिश की बूंदें,
सीप मे मोती फिर बनती कहाँ से ?
जब गिरती नहीं घटाओं से बिजली,
चमक आसमानों मे फिर बनती कहाँ से ?

जब गिरती नहीं बर्फ चट्टानों पर,
हिमालय फिर तब बनते कहाँ से ?
जब गिरती नहीं चींटी,
चट्टानों से हौसले फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरती नहीं कोई धारा,
नदियाँ फिर भला बनती कहाँ से ?
जब गिरती नहीं कोई नदिया,
समुंदर भला फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरता नहीं कोई बच्चा,
चलता भला फिर वो कहाँ से ?
और गिरता नहीं गर कोई जहां मे,
संभलता भला फिर कोई कहाँ से?  

Tuesday, March 1, 2016

भूमिका...

बधाई हो! घर में “बेटी” आयी है,
भाइयों की ख़ातिर एक “बहिन” आयी है,
बहिनों की प्यारी एक “सहेली” आई है…

फिर लक्ष्मी बनकर, घर में “बहू” आयी है,
“पत्नी” बनकर साथ निभाने आयी है,
रुठों को मनाने, एक “भाभी” आयी है...

“सास” बनकर, परंपरा बताने आयी है,
बड़ी बहिन का प्यार “जेठानी” लायी है,
“देवरानी” खुद हाथ बटाने आयी है,
नौक झोंक थोड़ी सी, “ननद” लायी है…

“माँ” बनकर, ममता फैलाने आयी है,
रिश्तों की बेल, आगे बढ़ाने आयी है,  
कभी बनती “मौसी”, कभी बनती “मामी”
“चाची” है कभी तो, कभी बनी “ताई” है...

रिश्तों के नन्हें अंकुरण सीचने,
झुर्री वाली “दादी” आयी है,
अनुभवो को जीकर, “नानी”

सुनाने ये, कहानी आयी है...

Thursday, September 24, 2015

अहमियत...

कुछ तो सहारे रखिए, ज़िंदगी मे जनाब,
अपने कंधों पे कभी, जनाजे नहीं निकलते !