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Tuesday, March 22, 2016

गिरने की चिंता ?


जब गिरते नहीं पत्ते सूखे,
नाज़ुक से पत्ते फिर उगते कहाँ से ?
जब गिरते नहीं वृक्षों से फल,
बीज नए वृक्षों के फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरतीं नहीं बारिश की बूंदें,
सीप मे मोती फिर बनती कहाँ से ?
जब गिरती नहीं घटाओं से बिजली,
चमक आसमानों मे फिर बनती कहाँ से ?

जब गिरती नहीं बर्फ चट्टानों पर,
हिमालय फिर तब बनते कहाँ से ?
जब गिरती नहीं चींटी,
चट्टानों से हौसले फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरती नहीं कोई धारा,
नदियाँ फिर भला बनती कहाँ से ?
जब गिरती नहीं कोई नदिया,
समुंदर भला फिर बनते कहाँ से ?

जब गिरता नहीं कोई बच्चा,
चलता भला फिर वो कहाँ से ?
और गिरता नहीं गर कोई जहां मे,
संभलता भला फिर कोई कहाँ से?  

Tuesday, March 1, 2016

भूमिका...

बधाई हो! घर में बेटी आयी है,
भाइयों की ख़ातिर एक बहिनआयी है,
बहिनों की प्यारी एक सहेलीआई है

फिर लक्ष्मी बनकर, घर में बहू आयी है,
पत्नीबनकर साथ निभाने आयी है,
रुठों को मनाने, एक भाभीआयी है...

सासबनकर, परंपरा बताने आयी है,
बड़ी बहिन का प्यार जेठानीलायी है,
देवरानीखुद हाथ बटाने आयी है,
नौक झोंक थोड़ी सी, “ननदलायी है

“माँ” बनकर, ममता फैलाने आयी है,
रिश्तों की बेल, आगे बढ़ाने आयी है,  
कभी बनती मौसी”, कभी बनती मामी
चाचीहै कभी तो, कभी बनी ताईहै...

रिश्तों के नन्हें अंकुरण सीचने,
झुर्री वाली “दादी” आयी है,
अनुभवो को जीकर, “नानी”

सुनाने ये, कहानी आयी है...

Thursday, September 24, 2015

अहमियत...

कुछ तो सहारे रखिए, ज़िंदगी मे जनाब,
अपने कंधों पे कभी, जनाजे नहीं निकलते !

Wednesday, May 13, 2015

साक्षात्कार.....


जागा था मानोआज,
जैसे कोईचिरनिद्रा के बाद,
आई थी सुबहआज की,
कुछ अचंभे के साथ !

सूरज की किरणें समा रही थीं,
हर अंग और हर रक्त कण में,
हवा भी जैसे छू रही थी,
दिल के हर कोने को !

दिन की प्रभा भी,
आज दिव्यता के साथ आयी थी!
कण कण मे इस धरा के,
मानो रौशनी सी समाई थी !

नव-जात किरणेंधरती के,
चरणों को चूम रही थीं!
हँस रहे थे फूल सारे,
हर कली खुद मे झूम रही थी !

फूलों की भी गंध,
पवन मे घुल रही थी,
पक्षियों की भी,
तान से तान मिल रही थी!

लग रही थी आज मानो,
हर ख़्वाहिश जैसे पूरी सी!
औरहर सपना मानो पूरा सा,
नहीं कोई हसरत जरूरी सी!

इतनी शांति! मानो जैसे,
मुहूर्त हो ब्रह्म का!
रोम रोम महसूस करता
आनंदमानो दिव्य सा !

महसूस होता जैसे,
हूँ संतोषके शिखर पर!
हो जैसे मानो बांसुरी,
खुद कृष्ण के अधरपर!

रंग आसमा का भी,
जैसे चमक स्वर्ण सी कोई,
धरा ने भी हरियाली की,
ओढ़ की थी चादर नई!

जन्म लेता मन मे,
हर पल एक प्रश्न नया
जिज्ञासा जैसे हो कोई,
एक नवजात बालक की !

क्यूँकबकैसेकहाँ,
कब तककिसनेकौन?
उत्तर सबका एक ही,
बस चारों ओर मौन”!

आँखें भीअब हो चली थी,
कुछ नम सीइस दिव्य छटा से,
आशा बस थी अब,
बस उस परम पिता से!

करबद्ध होकरहृदय से,
बस उसको पुकारा था,
तभी मानो किसी स्नेह से,
माथे को दुलारा था!

पानी की कुछ बूंदे,
चेहरे को छु रही थी,
आँखें खुली तो देखा,
माँ रो रही थी!!

आँखें खुलीजब मेरी,
आँचल मे उसने भर लिया
स्नेह का समुंदर जैसे,
मुझपे उढेल दिया !

प्रश्न मानो खुद बख़ुद,
हल जैसे हो रहे थे !
मात-पिता भाई-बहिन,
जब अपने आँसू पोछ रहे थे !

बस एक ही सवाल,
जिसका न अब जवाब था,
जागा मैं अब हूँ?
या सोया मैं अब था !