अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
महफ़िलें तो तब भी थी, और अब भी हैं यारा,
तब यारों का साथ था, अब अपनों का संग है।
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