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Friday, January 3, 2014

व्यथा... (TRAGEDY)



पहली बार, पुलिस थाने में,
एक अनोखा ! केस आया,
“नवजात” बेटी का गला,
एक माँ ने था दबाया !

पूंछा गया माँ से,
क्यूँ? ऐसा कदम उठाया,
क्या? शादी के दहेज़ की,
चिंता ने था सताया..

“छोडिये साब”, दहेज़ की चिंता,
अब किसको सताती है,
कंधे से कन्धा मिलाके,
बेटियाँ अब कमाती हैं I

फिर क्यूँ ? तुमने ये,
दर्दनाक कदम उठाया,
क्या तुम्हारा ऐसा करते,
दिल नहीं घबराया ?

फिर बोली वो..........बहुत सोचके,
है ये कदम उठाया,
कई बार इस जहां में,
उसे मरने से है बचाया !!

कैसे?, बड़े आश्चर्य ! से,
पूंछा गया उस माँ से,
सन्नाटा सा था छा गया,
जिसके उस बयाँ से,

माँ बोली.... मरती है पहली बार,
जब “कंधे का बोझ” कहते हो !
मरती है दूजी बार जब,
“अबला” इसे समझते हो !
मरती है तीजी बार जब,
बेटों से नीचा समझते हो !
मरती है चौथी बार जब,
चरित्र पे ताने कसते हो !
और, मर ही जाती है हर बार,
जब तुम “शील” को इसके डसते हो !!!

“साब”, ... तुम ही बताओ,
क्या करती वो जीके इस जहाँ में,
मरना ही था जब, उसको,
कई बार इस जहाँ में I

“साब”, .... विनती इतनी सी हैं,
इस माँ की,
करो व्यवस्था ऐसी,
आप यहाँ की i

“बेटियाँ” जब घर से निकलें,
दिल में उनके डर न आये,
घुमे फिरें, मस्ती में अपनी,
कोई न उनकी “इज्जत” खाय I

नहीं कोई माँ फिर ये,
“कृत्य” दोहरायेगी,
बेटी पैदा होने पे,
वो खुलके “जश्न” मनायेगी !!







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