महफ़िलें तो तब भी थी, और अब भी हैं यारा,
तब यारों का साथ था, अब अपनों का संग है।
अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
ऑक्सिजन चाहे घट भी जाए ,
या कमजोरी छा सी जाए,
कोरोना सी मुश्किल का,
सामना करते डरना मत,
इतना याद रहे मेरे साथी,
हो जिंदा जब तक, मरना मत।
चाहे धड़कन रुकती जाए,
या गिनती साँसों की कम जाए,
दिल और मन को अपने,
कंट्रोल से बाहर करना मत,
इतना याद रहे मेरे साथी,
हो जिंदा जब तक, मरना मत।
निकट लगे, जब अंत तुम्हारा,
घिर आए निराशा का अँधियारा,
जीना है जिनके लिए,
दूर ध्यान से, उन्हे करना मत,
इतना याद रहे मेरे साथी,
हो जिंदा जब तक, मरना मत।
फर्क नहीं पड़ता, जिन्हे
जो ज़िद पर अब
भी अड़े हैं।
और, जुदा धर्म का होने का,
राग अलापे खड़े
हैं।
मंदिरो और मस्जिदों,
पर जो राजनीति
लड़े हैं।
गौर से देख लें वे सभी,
ये जो खौफनाक
मंजर बड़े हैं।
सो गई है मस्जिदें
सारी,
और मंदिरों पे
ताले पड़े हैं,
चर्च के भी बड़े
बड़े घंटे,
अब सन्नाटे मे
खड़े हैं।
धर्म सभी इक दूजे से,
अब कोई नहीं बड़े
हैं।
एक छोटे से विषाणु
से,
क्योंकि हारे
सभी पड़े हैं।
अब संकट के इस काल
मे,
जो दिल साथ मे
खड़े हैं।
हर धर्म और संप्रदाय
से,
कई लाख गुना वे बड़े
हैं।