अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
Thursday, September 24, 2015
Wednesday, May 13, 2015
साक्षात्कार.....
जागा था मानो, आज,
जैसे कोई, चिरनिद्रा के बाद,
आई थी सुबह, आज की,
कुछ अचंभे के साथ !
सूरज की किरणें समा रही थीं,
हर अंग और हर रक्त कण में,
हवा भी जैसे छू रही थी,
दिल के हर कोने को !
दिन की प्रभा भी,
आज दिव्यता के साथ आयी थी!
कण कण मे इस धरा के,
मानो रौशनी सी समाई थी !
नव-जात किरणें, धरती के,
चरणों को चूम रही थीं!
हँस रहे थे फूल सारे,
हर कली खुद मे झूम रही थी !
फूलों की भी गंध,
पवन मे घुल रही थी,
पक्षियों की भी,
तान से तान मिल रही थी!
लग रही थी आज मानो,
हर ख़्वाहिश जैसे पूरी सी!
और, हर सपना मानो पूरा सा,
नहीं कोई हसरत जरूरी सी!
इतनी शांति! मानो जैसे,
मुहूर्त हो ब्रह्म का!
रोम रोम महसूस करता
“आनंद” मानो दिव्य सा !
महसूस होता जैसे,
हूँ “संतोष” के शिखर पर!
हो जैसे मानो बांसुरी,
खुद कृष्ण के “अधर” पर!
रंग आसमा का भी,
जैसे चमक स्वर्ण सी कोई,
धरा ने भी हरियाली की,
ओढ़ की थी चादर नई!
जन्म लेता मन मे,
हर पल एक प्रश्न नया
जिज्ञासा जैसे हो कोई,
एक नवजात बालक की !
क्यूँ, कब, कैसे, कहाँ,
कब तक, किसने, कौन?
उत्तर सबका एक ही,
बस चारों ओर “मौन”!
आँखें भी, अब हो चली थी,
कुछ नम सी, इस दिव्य छटा से,
आशा बस थी अब,
बस उस परम पिता से!
करबद्ध होकर, हृदय से,
बस उसको पुकारा था,
तभी मानो किसी स्नेह से,
माथे को दुलारा था!
पानी की कुछ बूंदे,
चेहरे को छु रही थी,
आँखें खुली तो देखा,
माँ रो रही थी!!
आँखें खुली, जब मेरी,
आँचल मे उसने भर लिया
स्नेह का समुंदर जैसे,
मुझपे उढेल दिया !
प्रश्न मानो खुद बख़ुद,
हल जैसे हो रहे थे !
मात-पिता भाई-बहिन,
जब अपने आँसू पोछ रहे थे !
बस एक ही सवाल,
जिसका न अब जवाब था,
जागा मैं अब हूँ?
या सोया मैं अब था !
Saturday, February 14, 2015
Friday, February 6, 2015
Saturday, January 17, 2015
मुड़के देखना...
जब मिलता है हौसला,
आगे बढ़ने का,
मुड़के पीछे देखना,
तब बुरा नहीं होता ।
जब आगे होता है रोमांच,
तो पीछे, अनुभव
जो देता, बेहतरी कोशशों को,
और नहीं दुहराता ग़लतियाँ।
जब आगे होता है वीरान,
तो पीछे, लोगों की होड़
जो रखती, तुमे आगे
और लक्ष्य के करीब।
जब आगे होती है मायूसी,
तो पीछे, जज्बा
जो देता, ताकत चलने की,
और प्रेरणा, नहीं दम भरने की।
जब आगे होता है मायाजाल,
तो पीछे, आशीष माँ बाप का,
जो नहीं भटकने देता,
और करता दृढ़ इरादों को।
जब आगे होता है भटकाव,
तो पीछे, उम्मीदें
जो देती हैं अनुशासन,
और मन पर नियंत्रण।
जब आगे होता है लड़कपन,
तो पीछे, जिम्मेदारियां,
जो देती हैं मर्यादा,
और रखती तुम्हे इंसान।
Thursday, January 15, 2015
दो पहलु जिंदगी के....
दो पहलु जिंदगी के,
एक के भरोसे कभी होना नहीं ,
डूबने का मतलब नहीं कि,
उदय तुम्हे फिर कभी होना नहीं ...
क्योंकि...
डूबता है रोज़, वैसे तो सूरज भी,
चमक उसकी मगर कम होती नहीं ,
और, लाख चमकें तारे गगन में,
सूरज बिना मगर सुबह होती नहीं....
do pehlu zindgi ke,
एक के भरोसे कभी होना नहीं ,
डूबने का मतलब नहीं कि,
उदय तुम्हे फिर कभी होना नहीं ...
क्योंकि...
डूबता है रोज़, वैसे तो सूरज भी,
चमक उसकी मगर कम होती नहीं ,
और, लाख चमकें तारे गगन में,
सूरज बिना मगर सुबह होती नहीं....
do pehlu zindgi ke,
ek ke bharose kabhi hona nahi,
dubne ka
matlab nahi ki,
uday
tumhe phir kabhi hona nahi,
kyonki,
dubta
hai roz, waise to suraj bhi,
chamak
uski magar, kam hoti nahi,
aur,
lakh chamke tare gagan me,
suraj bina magar, subah hoti nahi….
suraj bina magar, subah hoti nahi….
Monday, January 12, 2015
चमक...
चमक हीरों की भी, फीकी पड़ जाती है,
हर एक बूंद फिसलती है जब, उसकी ज़ुल्फों से !
chamak heeron ki bhi, feeki pad jati hai,
har ek bund fisalti hai jab, uski zulfon se !
Friday, January 9, 2015
शिकवा...
चंद दिन ही हुए अभी, दर से उनके गुज़रे,
वो ऐसे भूले हमें , मिले जैसे कभी नहीं !!
chand din hi hue abhi, dar se unke gujre,
wo aise bhule hume, mile jaise kabhi nahi !!
Wednesday, January 7, 2015
सबब...
अब
जाना हमने, सबब, इस काली रात का,
देखा
नहीं उसे, कुछ दिनों से खिड़की पे !!
dekha nahi
use, kuchh dinon se khidki pe !!
Thursday, January 1, 2015
नव वर्ष 2015 ...
नव
प्रभात की उज्ज्वल किरणें,
पल पल सबका, रौशन कर जाए,
फूलों
की ये ताजी खुशबू,
जीवन
का हर, पल महकाए,
पंछियों
का ये मधुर कलरव,
खुशियों
का नित , राग सुनाए,
हर
दिन महके, हर पल खुश हो,
नव
वर्ष की, ये शुभ कामनाए…
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