सदियों से रातों में, यूँ ही मुस्कुरा रहा था,
ख़ूबसूरती पे अपनी, इतरा रहा था,
माना की दाग थे, मेरे इस रूप में,
मिसाल ख़ूबसूरती की, फिर भी पा रहा था...
घटने बढ़ने की, अदायें दिखा रहा था,
लाता कभी “ईद”, कभी “पूनम” बन जा रहा था,
बनके रूप यौवन का, ज़माने को दिखा रहा था,
और “घूंघट” में दुल्हन भी, बन जा रहा था,
मगर ए खुदा, मुझे इतना दे बता,
हो गई मुझसे, क्या ऐसी खता ?
काली घटाओं में, मुझे छुपा दिया,
उस पर्दानशीं की शक्ल में,
एक और चाँद, जमीं पे ला दिया !
माना की दाग थे, मेरे इस रूप में,
ReplyDeleteमिसाल ख़ूबसूरती की, फिर भी पा रहा था... चाँद (MOON)