जन्म लेते ही, जो लाचार सा होता है।
अपने बेबस हाल पर हर पल जो रोता है।
चल न पाए जो एक भी कदम,
हर पल सिर्फ सहारे ढूँढे फिरता है।
पशु भी इससे बेहतर होते है,
जन्म लेते ही अपने पैरों पर खड़े होते हैं।
पर शरीर जब इसका चलता है,
दिमाग का भी रंग बदलता है।
कल तक था जो लाचार सा,
अब वह अहम मे ढलता है।
ब्र्म्हांड का स्वामी खुद को समझता है,
अहम के जाल वह अब बुनता है।
शरीर, रंग, पद, और समाज का,
रौब अब दिखाता है।
कर्तव्य को भूलकर अपने,
अब अधिकार जताता है।
सृष्टि पर मानो अपना,
अब वर्चस्व सा दिखाता है।
खुद के आगे, अन्य जीवों का,
अस्तित्व ये भुलाता है।
अपने स्वार्थ और अहम के लिए,
अन्यों को को सताता है।
भौतिकवादी उपलब्धियों को,
अपनी शान बताता है।
जाति, धर्म और संप्रदाय की खातिर,
औरों को नीचे दिखाता है।
"मानव" ही एक मात्र स्वामी इसका,
धारा पर ऐसा भाव दिखाता है।
इस धरा के अमूल्य तत्वों का,
दिन रात ये दोहन करता है।
सारी मर्यादाओं को भूलकर,
स्वार्थ का दिन रात घड़ा ये भरता है।
काश, इतनी सी बात
अगर समझ ये जाता।
हर कोई है यहाँ बस,
यूं ही आता जाता।
अनंत इस ब्र्म्हांड का तुम,
छोटा सा इक कण हो।
सद काम ऐसे हों तुम्हारे,
हो चुकाने जैसे कोई ऋण हो।
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