जब ग़म की तलाश है,
तो खुशी मिले कहाँ से!
जब रोने की तलाश है,
तो हँसी मिले कहाँ से!
जब गिरने की तलाश है,
तो कोई सम्हले कहाँ से!
जब रूठने की तलाश है,
तो कोई बहले कहाँ से!
जब काँटों की तलाश है,
तो मिले फूल कहाँ से !
जब सहेजने की तलाश है,
तो भूल मिले कहाँ से !
जब पतझर की तलाश है,
तो बाहर मिले कहाँ से!
जब नफरत की तलाश है!
तो प्यार मिले कहाँ से !
जब नास्तिकी की तलाश है,
तो बंदगी मिले कहाँ से !
जब मौत की तलाश है,
तो ज़िंदगी मिले कहाँ से !
अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
Saturday, May 25, 2019
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ...
रुके बिना नित,
चलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।
धूप हो या,
छांव हो,
छाले पड़े
या घाव हो
अपनी राह
पकड़ता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।
सुख हो या,
दुःख हो,
आंधियों का,
चाहे रुख हो,
यूं ही नहीं
पिघलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।
फूलों की
आशा नहीं करता,
काँटों से भी,
नहीं हूँ डरता,
कभी कभी
अंगारों से भी मिलता हूँ,
मैं, इसलिए आगे बढ़ता हूँ।
रुके बिना नित,
चलता हूँ,
मैं,
इसलिए आगे
बढ़ता हूँ।
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