सर्दियों की खुशनुमा,
एक शाम थी,
देने को आई शायद,
कुछ नया पैगाम थी।
ट्राफिक की चाल,
कुछ मायूस कर रही थी,
नकारात्मक्ता की आग, जो,
मुझमे भर रही थी।
इसी बीच अलग सा,
कुछ घट गया था,
अब ध्यान मेरा ट्रेफिक से
हट गया था।
एक टेम्पो, जो मेरे (कार) आगे,
चल रही थी,
ट्रॉली जिसकी आज,
रंगीन चेहरों से खिल रही थी।
चंद रुपयों के शृंगारों से,
वो सारे चेहरे खिले हुए थे ।
खुशी और मुस्कान जैसे,
दोनों मिले हुए थे।
बस काफी था,
इतना समझने के लिए।
जिंदगी है, हर हाल मे,
खुश रहने के लिए।

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