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Monday, January 29, 2018

आत्मा कथा....


क्या बचपन, क्या जवानी,
क्या सुबह और क्या शाम,
बना रखा था इसने,
मुझे खुद का ग़ुलाम।

क्या सही और क्या गलत,
और बिना पछताए,
पसंद थे जो सभी,
काम मुझसे करवाए।

उठना हो या, सोना हो,
हँसना हो या रोना हो,
करता मैं सब कुछ ऐसे,
जैसे कोई खिलोना हो।

जो मैं था, उसे ये
खुद को बताता रहा,
मुझे इस जहां से,
छुपाता रहा।

गर चला अब और,
इसकी राह पर,
न हो फिर परमगति,
की चाह फिर।

एक न चलेगी इसकी,
ऐसा कुछ अब सोच लिया है,
खुद को क्योंकि मैंने अब,
खोज लिया है।

सारथी है ये मेरा,
इसको ये मानना होगा,
मैं हूँ क्या, अब इसे,
ये जानना होगा।

करके वश मे इसको,
ले जाऊंगा अब वहाँ पे,
भवसागर से तरने वाला,
रहता है जहां पे।



Tuesday, January 23, 2018

खुश रहिए !



सर्दियों की खुशनुमा,
एक शाम थी,
देने को आई शायद,
कुछ नया पैगाम थी।

ट्राफिक की चाल,
कुछ मायूस कर रही थी,
नकारात्मक्ता की आगजो,
मुझमे भर रही थी।

इसी बीच अलग सा
कुछ घट गया था,
अब ध्यान मेरा ट्रेफिक से
हट गया था।

एक टेम्पोजो मेरे (कार) आगे,
चल रही थी,
ट्रॉली जिसकी आज,
रंगीन चेहरों से खिल रही थी।  

चंद रुपयों के शृंगारों से,
वो सारे चेहरे खिले हुए थे ।
खुशी और मुस्कान जैसे,
दोनों मिले हुए थे।   

बस काफी था,
इतना समझने के लिए।
जिंदगी हैहर हाल मे,
खुश रहने के लिए।