अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
चल रही थी तेरे साथ, कायनात, ये मेरे संग, न साथ हैं तेरे वगैर, खुद मेरे अपने कदम....
subhanallah :)
शुक्रिया शिखा जी :)
चल रही थी तेरे साथ, कायनात, ये मेरे संग,
ReplyDeleteन साथ हैं तेरे वगैर, खुद मेरे अपने कदम....
subhanallah :)
ReplyDeleteशुक्रिया शिखा जी :)
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