अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
आदत सी, दर्द सहने की, हो गई है कुछ इस तरह, अपने ही ज़ख्मों को यारों, हम खुद कुरेदते रहते हैं....
wah wah wah :)
shukriya shikha ji :)
Hoping for the best more articles.. good works
आदत सी, दर्द सहने की, हो गई है कुछ इस तरह,
ReplyDeleteअपने ही ज़ख्मों को यारों, हम खुद कुरेदते रहते हैं....
wah wah wah :)
ReplyDeleteshukriya shikha ji :)
DeleteHoping for the best more articles.. good works
ReplyDelete