इक मुलाकात की, आस लगाये बैठे हैं,
आपकी याद में, हम खुदको भुलाये बैठे हैं...
यूँ तो हर कोई, यादों में बसाये बैठे है हमें,
एक आप हैं, जो हमें कबसे भुलाये बैठें हैं...
यूँ तो करता नहीं कोई, हमसे कभी गिला,
एक आप हैं, जो हजार शिकवे लगाये बैठे हैं...
यूँ तो गुजरते हैं सभी, इन राहों से,
एक आप हैं जो, नई राह बना बैठे हैं....
यूँ तो हर फरियादी को, देता है सब खुदा,
एक हम है जो, कबसे हाथ फैलाये बैठे हैं.....
Bravo!!! very well written :)
ReplyDeleteThanks for kind appreciation :)
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