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Sunday, March 10, 2013

अनकही...



इक वो हैं,
जो अहसानों को छुपाते नहीं,
एक हम हैं,
जो कुछ भी जताते नहीं...

वो समझते हैं,
हम खुश हैं, उनकी महफ़िल में,
ग़मों को क्यूंकि अपने,
उन्हें हम बताते नहीं....

गुनाह करके भी खुदको,
बेगुनाह समझते हैं वो,
एहसास क्यूंकि उनको,
कभी हम दिलाते नहीं...

शिकवे और गिले ही बस,
गिनते रहते हैं वो,
वफाओं का हमारी,
वो जश्न मानते नहीं...

अपनी जुबान भी,
नहीं करती, उनका कोई गिला,
और खामोशियों को वो,
वो समझ पाते नहीं...

सिर्फ आँखों के,
आंसुओं को देख पाते हैं वो,
ये दिल भी रो सकता है,
वो ये समझ पाते नहीं...

और हद है! खुदा भी करता है,
वफ़ा उन्ही के साथ,
हाथ अपने लिए क्यूंकि,
कभी हम फैलाते नहीं...  

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