कब तक भटकते रहोगे, सुकून की तलाश मे,
अपने ही दिल मे शायर, इसे पाना सीख लीजिये।
कहते हैं मंजिल सफर है मुश्किलों का,
राह मे इसके कदम बढ़ाना सीख लीजिये।
रूठ जाते है जो रिश्ते तुम्हारे तरीकों से,
उन रिश्तों को अब, मनाना सीख लीजिये।
देर हो जाती है अक्सर तुम्हें घर पर आने मे,
इंतज़ार करती आँखों को, हंसाना सीख लीजिये।
हो जाती हैं ग़लतियाँ अपनो से कभी कभी,
माफ कर उन्हे गले से, लगाना सीख लीजिये।
जरूरी नहीं हर बात मे, तुम्हारा जिक्र हो,
औरों के हुनर को साहब, अपनाना सीख लीजिये।