नेकी का सलीका, कोई सीखे इन रास्तों से,
मंजिलों तक पहुँचाते हैं, फिर भी अहसान नहीं जताते।
अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
तुम भी आओ हम भी आएं
आजादी का
पर्व मनाएं
हो फिज़ा कुछ ऐसी जिसमे
हर मन हो जाए चंगा
देशभक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा
मंदिर झूमे, मस्जिद झूमे
गिरजाघर और गुरुद्वारे भी झूमे
मदमस्त धुन में लहराकर
गगन हो जाए कुछ रंग बिरंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा
हर जन झूमे हर जन गाए
मातृभूमि को शीष नवाएं
हर दिल को पवन कर जाए
ऐसी आज बह जाए गंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा
एकता के सूत्र में रहकर
दिखलाना है देशप्रेम की शक्ति,
गलती से भी कमजोर समझ
कोई हमसे न ले जाए पंगा
देश भक्ति की ज्योति जगाने
आओ लहराएं हर घर तिरंगा