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Sunday, April 13, 2014

अंजान...

याद करके, उन्हे भूल जाना, हमे नहीं आता
खुद रोते हैं मगर उनको रुलाना, हमे नहीं आता।

कैसे रहें खुश हम ?, अपनी खुशियों की खातिर,
ऐसे जश्नो को मनाना, हमे नहीं आता।

अहसानो तले उनके, तमाम उम्र बिता दी,
क्यूंकि अहसानो को जाताना, हमे नहीं आता ।

रूठे रहे वो मुझसे, तमाम उम्र मेरे यार,
क्यूंकि रूठों को मनाना, हमे नहीं आता।

यादों और ख़ाबों मे भी, सताते हैं वो,
मगर उनके ख़ाबों मे आना, हमे नहीं आता।

सोचता हूँ, रुसवा कर दूँ उन्हे इस जहां मे,
मगर दर्द को बताना, हमे नहीं आता।

बैठा हूँ अब भी, उन्ही के इंतज़ार मे,
क्यूंकि यूं ही हार जाना, हमे नहीं आता। 

3 comments:

  1. यादों और ख़ाबों मे भी, सताते हैं वो,
    मगर उनके ख़ाबों मे आना, हमे नहीं आता।

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  2. वाह क्या बात है ... शायद कोई अंजना बंधन जोड़ने के लिए तत्पर हो जाता है कभी कभी ...
    वैसे ये ग़ज़ल करीब ६-८ महीने ही लिखी थी मैंने बस ब्लॉग पर आज डाली है ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया :)

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