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Friday, August 23, 2013

मुझे जीने दो... (THE VOICE OF A GIRL)

निकलूं मैं क्यूँ बाहर,
सीने में डर को लेकर?
क्यूँ रास्तों पे चलूँ मैं,
नज़रें मेरी झुकाकर?

क्यूँ सहमी सीरहूँ मैं,
खुद अपने ही शहर में ?
क्यूँ दबी सी रहूँ मैं,
अपने ही बसर में?

क्यूँ रास्तों पे चलते मुझे,
नजरें वो घूरतीं हैं ?
क्यूँ स्वभिमान मेरा,
हर वक्त चीरतीं हैं ?

क्यूँ करूँ सफ़र मैं,
मिर्ची का स्प्रे लेकर ?
क्यूँ निकलूं मैं बाहरकिसी
सहारे को लेकर ?

क्यूँ याद नहीं होतीतुम्हे
अपनी माँबहनबेटी ?
जब जल्लादों की तरह,
इज्जत मेरी लूटी.....

मुझको भी मेरी साँसों को,
आजाद हैंये कहने दो......
अपनी ही तरह मुझको भी,
सर उठा के जीने दो...