अल्फ़ाज़ों में बयां होते हैं, कभी खुशी तो कभी ग़म, इन्हें रचनाओं में पिरोती, मेरी "गुनगुनाती कलम"
क्यों भटके कोई, जन्नत की तलाश मे,
आशियाना हो गर तेरी जुल्फों की छाँव मे।
बेअसर हो जाती है, जद्दो जहद ज़िंदगी की,
लौट आता हूँ जब तेरी जुल्फों की छाँव मे।
लाख गुनाहों की सज़ा, कुबूल है हमें,
कैदखाना गर तेरी जुल्फों का बना हो।
अंदाज़ शायराना सा लगता है, इन घटाओं का,
बूंदों ने इनकी शायद, आज भिगाया है तुझे।
बनाके जबसे भेजा है उसने, तुझको जमीन पर,
गुरूर तबसे करता है वो, अपने हुनर पर।
सुना था मुकद्दर अपना, खुद बनाते हैं लोग,
आपको जाना तो यकीं या गया।