न ही तू हिन्दू है, और न ही तू मुस्लिम,
और जो है तू, वो है तुझमे ही छुपा।
करते हैं जो नमन, वंदना किसी मूरत की,
उठ जाते है वही हाथ, बनके किसी बंदे की दुआ।
झुकता है जो सर, मंदिरों की दहलीज़ पर,
करता है वही झुकके, मस्जिदों मे सजदा।
बंद होती हैं जो आँखें, प्रार्थना के लिए,
नमाज मे वही आँखें, बस देखती हैं खुदा।