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Thursday, April 24, 2014

कश्मकश...


दर्द करे 
बयाँ अपना, कैसे कोई शायर?
दाद देते हैं सभी, उसके हर अंदाज़े बयाँ पर!

Sunday, April 13, 2014

अंजान...

याद करके, उन्हे भूल जाना, हमे नहीं आता
खुद रोते हैं मगर उनको रुलाना, हमे नहीं आता।

कैसे रहें खुश हम ?, अपनी खुशियों की खातिर,
ऐसे जश्नो को मनाना, हमे नहीं आता।

अहसानो तले उनके, तमाम उम्र बिता दी,
क्यूंकि अहसानो को जाताना, हमे नहीं आता ।

रूठे रहे वो मुझसे, तमाम उम्र मेरे यार,
क्यूंकि रूठों को मनाना, हमे नहीं आता।

यादों और ख़ाबों मे भी, सताते हैं वो,
मगर उनके ख़ाबों मे आना, हमे नहीं आता।

सोचता हूँ, रुसवा कर दूँ उन्हे इस जहां मे,
मगर दर्द को बताना, हमे नहीं आता।

बैठा हूँ अब भी, उन्ही के इंतज़ार मे,
क्यूंकि यूं ही हार जाना, हमे नहीं आता।